Retired SC Judge MB Lokur Said A Provision Of UAPA More Dangerous Than Sedition

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Retired Judge MB Lokur UAPA: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एमबी लोकुर ने शनिवार को कहा कि राजद्रोह पर शीर्ष अदालत का 11 मई का आदेश महत्वपूर्ण है. वहीं, उन्होंने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) के एक प्रावधान के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई. ‘राजद्रोह से आजादी’ कार्यक्रम में पूर्व न्यायाधीश ने शीर्ष अदालत द्वारा पारित अंतरिम आदेश के मायने समझाने की कोशिश की. शीर्ष अदालत ने आजादी से पूर्व के राजद्रोह कानून के तहत देश में सभी कार्यवाहियों पर तब तक के लिए रोक लगा दी है जब तक कि कोई उपयुक्त सरकारी मंच इसकी फिर से जांच नहीं करता और निर्देश दिया कि केंद्र और राज्य अपराध का हवाला देते हुए कोई नयी प्राथमिकी दर्ज नहीं करेंगे. 

लोकुर ने कहा, “मुझे नहीं पता कि सरकार राजद्रोह के प्रावधान के बारे में क्या करेगी. लेकिन मेरी राय में वह इसे हटा देगी. लेकिन उतना ही चिंताजनक यूएपीए में धारा 13 का एक समानांतर प्रावधान है जो कहता है कि जो कोई भी भारत के खिलाफ असंतोष पैदा करना चाहता है या करने का इरादा रखता है.”

यह खराब से बदतर स्थिति में जाने जैसा होगा
उन्होंने कहा, “राजद्रोह में यह सरकार के खिलाफ असंतोष है लेकिन यूएपीए प्रावधान में यह भारत के खिलाफ असंतोष है, बस यही अंतर है. राजद्रोह में कुछ अपवाद थे जहां राजद्रोह के आरोप लागू नहीं किए जा सकते लेकिन यूएपीए की धारा 13 के तहत कोई अपवाद नहीं हैं. यदि यह प्रावधान बना रहता है, तो यह खराब से बदतर स्थिति में जाने जैसा होगा.”  पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि राज्य असंतोष के रूप में क्या देखता है, यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है, यह बहुत खतरनाक है क्योंकि यूएपीए के तहत जमानत प्राप्त करना कठिन है. उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 11 मई के अपने आदेश में राजद्रोह के मामलों में जांच पर रोक लगा दी थी और देश भर में राजद्रोह कानून के तहत लंबित मुकदमों और सभी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी थी. 

पूर्व न्यायाधीश ने और क्या कहा?
पूर्व न्यायाधीश ने कहा, “देश भर में लंबित मुकदमे और राजद्रोह कानून के तहत सभी कार्यवाहियों पर यह यथास्थिति एक नुकसानदेह हिस्सा है. मान लीजिए कि एक व्यक्ति जो निर्दोष है, लेकिन राजद्रोह के तहत उसके खिलाफ झूठा मामला दर्ज किया गया है और चाहता है कि मुकदमा पूरा हो जाए, तो उसे कुछ समय इंतजार करना होगा.” उन्होंने कहा, “इसी तरह, अगर किसी को राजद्रोह के तहत दोषी ठहराया जाता है और उसने अपनी सजा के खिलाफ अपील दायर की है, तो उसे भी इस तरह की यथास्थिति को हटाए जाने तक इंतजार करना होगा.” 

यथास्थिति आदेश समस्या पैदा कर सकता है- लोकुर
लोकुर ने कहा कि बेहतर होता अगर शीर्ष अदालत ने इस यथास्थिति का आदेश नहीं दिया होता और इसके बजाय ऐसे लोगों को राहत देने के लिए एक तंत्र तैयार करना चाहिए था. उन्होंने युवा पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि का उल्लेख किया, जिनके पासपोर्ट पर रोक लगा दी गई और वह कोपेनहेगन के एक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए नहीं जा सकीं क्योंकि उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया था. पूर्व न्यायाधीश ने लोकुर ने कहा, “जो लोग राजद्रोह के प्रावधान का सामना कर रहे हैं उन्हें कुछ सुरक्षा की आवश्यकता है, क्योंकि यदि उनके मुकदमे पर रोक लगा दी जाती है तो उन्हें निर्णय आने के लिए अनिश्चित काल तक इंतजार करना होगा. यह यथास्थिति आदेश कुछ समस्या पैदा कर सकता है.” 

पत्थरगढ़ी आंदोलन में 11,109 लोगों पर राजद्रोह के आरोप का दावा
दो महिला पत्रकारों पेट्रीसिया मुखिम और अनुराधा भसीन की तरफ से शीर्ष अदालत में राजद्रोह मामले में पेश हो चुकीं वकील-कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर ने भी 11 मई के आदेश को महत्वपूर्ण करार दिया. ग्रोवर ने कहा कि मुखिम और भसीन जैसी याचिकाकर्ताओं का मानना है कि राजद्रोह कानून प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है और इसे रोकना एक महत्वपूर्ण कदम है. मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने झारखंड के आदिवासी इलाकों में हुए पत्थरगढ़ी आंदोलन का उल्लेख किया, जिसके बारे में उन्होंने दावा किया कि 11,109 लोगों पर राजद्रोह के आरोप लगाए गए थे. 

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